राशन का खेल खत्म! अब चावल-गेहूं नहीं, सीधे खाते में मिलेगा पैसा – मोदी सरकार का बड़ा फैसला

राशन का खेल खत्म! अब चावल-गेहूं नहीं, सीधे खाते में मिलेगा पैसा – मोदी सरकार का बड़ा फैसला

राशन का खेल खत्म! अब चावल-गेहूं नहीं, सीधे खाते में मिलेगा पैसा – मोदी सरकार का बड़ा फैसला, भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) यानी राशन प्रणाली में एक ऐतिहासिक बदलाव की तैयारी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने “वन नेशन, वन राशन कार्ड” जैसे सुधारों के बाद अब एक और बड़े फैसले की आहट दी है। यह फैसला है – राशन की दुकानों पर सब्सिडी वाला अनाज देने के बजाय,

उस सब्सिडी की रकम सीधे लाभार्थियों के बैंक खाते में डालना। इसे “डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) फॉर राशन” या “कैश ट्रांसफर इन ल्यू ऑफ फूड सब्सिडी” के नाम से जाना जा रहा है। इसका मतलब यह हुआ कि करोड़ों परिवारों को अब महीने-दर-महीने राशन की दुकान पर जाकर चावल-गेहूं लेने के बजाय, उनकी कीमत के बराबर की नकद राशि सीधे उनके खाते में मिल सकती है। सरकार का दावा है कि इससे ‘राशन के खेल’ यानी भ्रष्टाचार, रिसाव और बिचौलियों पर लगाम लगेगी। लेकिन विशेषज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ता इस बदलाव के व्यावहारिक पहलुओं और संभावित जोखिमों पर सवाल उठा रहे हैं।

भारत की राशन प्रणाली: एक नजर में (इतिहास और वर्तमान)

राशन का खेल खत्म! अब चावल-गेहूं नहीं, सीधे खाते में मिलेगा पैसा – मोदी सरकार का बड़ा फैसला, भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की शुरुआत द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अनाज के राशनिंग के साथ हुई। स्वतंत्रता के बाद, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इसे एक स्थायी व्यवस्था बना दिया गया। इसका मुख्य उद्देश्य गरीब और जरूरतमंद परिवारों को सस्ती दर पर खाद्यान्न उपलब्ध कराना रहा है।

मौजूदा ढांचा:

  • लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीपीडीएस): 1997 में शुरू हुई, जिसने लाभार्थियों को ‘प्राथमिकता’ (एपीएल) और ‘अति प्राथमिकता’ (बीपीएल) श्रेणियों में बांटा।

  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए), 2013: यह एक क्रांतिकारी कानून था। इसके तहत देश की लगभग 67% आबादी (लगभग 80 करोड़ लोग) को रियायती दरों पर अनाज पाने का कानूनी अधिकार मिला।

    • प्रति व्यक्ति 5 किलो अनाज (चावल ₹3/किलो, गेहूं ₹2/किलो, मोटे अनाज ₹1/किलो)।

    • एक परिवार को महीने में अधिकतम 35 किलो।

  • पीडीएस चैनल: केंद्र सरकार → राज्य सरकारें/एफसीआई → जिला गोदाम → फेयर प्राइस शॉप (एफपीएस) → लाभार्थी।

मुख्य समस्याएं जिन्हें दूर करना है:

  1. रिसाव और भ्रष्टाचार: अनाज के भंडारण और परिवहन में चोरी, खराब गुणवत्ता वाला अनाज देना।

  2. बिचौलियों का वर्चस्व: कई जगहों पर राशन डीलर मनमानी करते थे, लाभार्थियों को पूरा राशन नहीं देते थे।

  3. पहचान की चुनौती: गलत कार्डधारक, फर्जी राशन कार्ड।

  4. सेवा की खराब गुणवत्ता: लंबी कतारें, दुकानें बंद रहना, समय पर अनाज न मिलना।

डीबीटी मॉडल क्या है? यह कैसे काम करेगा?

डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर यानि प्रत्यक्ष लाभ अंतरण का मतलब है कि सब्सिडी की रकम सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में पहुंचाई जाए। राशन के मामले में, प्रस्तावित मॉडल दो तरह का हो सकता है:

  1. कैश ट्रांसफर (नकद हस्तांतरण): लाभार्थी को उसके हिस्से के अनाज की सरकारी सब्सिडी (बाजार मूल्य और एनएफएसए मूल्य के बीच का अंतर) सीधे उसके खाते में डाल दी जाए। उदाहरण: अगर बाजार में चावल ₹30/किलो है और एनएफएसए दर ₹3/किलो है, तो सब्सिडी है ₹27 प्रति किलो। एक व्यक्ति को 5 किलो का हक है, तो उसे मिलेगी ₹27 x 5 = ₹135 प्रति व्यक्ति प्रति माह सीधे खाते में। परिवार के सदस्यों के हिसाब से रकम जुड़ जाएगी।

  2. फूड कूपन/ई-वाउचर: एक डिजिटल वाउचर दिया जाए, जिसे लाभार्थी किसी भी अधिकृत दुकान (सिर्फ राशन दुकान नहीं) से अनाज खरीदने पर इस्तेमाल कर सके।

क्रियाविधि (प्रस्तावित):

  • लाभार्थी का आधार कार्ड, राशन कार्ड और बैंक खाता लिंक होगा।

  • एनएफएसए के तहत पात्र व्यक्तियों/परिवारों की सूची पहले से मौजूद है।

  • हर महीने एक निर्धारित तारीख पर, सब्सिडी की रकम सीधे जन-धन या अन्य लिंक्ड खाते में ट्रांसफर हो जाएगी।

  • लाभार्थी स्वतंत्र होगा कि वह किस दुकान से, किस ब्रांड का अनाज खरीदे।

सरकार के तर्क: इस बदलाव के क्या फायदे हैं?

सरकार और इस मॉडल के समर्थक कई मजबूत कारण गिनाते हैं:

सिरियल सरकार का तर्क (फायदा) विस्तार
1. भ्रष्टाचार और रिसाव पर रोक अनाज के भौतिक बहाव में घूस, चोरी, फर्जीवाड़ा होता है। पैसा सीधे खाते में जाने से यह रुकेगा। सरकार का दावा है कि डीबीटी से सब्सिडी का 100% लाभार्थी तक पहुंचेगा।
2. लाभार्थी को पसंद की आजादी अब लोग राशन दुकान के मनमाने अनाज के बजाय बाजार से अपनी पसंद का ब्रांड, गुणवत्ता और किस्म का अनाज खरीद सकेंगे।
3. खाद्य प्रणाली की दक्षता बढ़ेगी भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को इतने बड़े पैमाने पर अनाज का खरीद, भंडारण और ढुलाई नहीं करनी पड़ेगी। इससे सरकार का खर्च कम होगा और बर्बादी (wastage) भी घटेगी।
4. किसानों को बेहतर मूल्य मिलने की संभावना अगर लोग बाजार से सीधे अनाज खरीदेंगे, तो मांग बढ़ेगी, जिससे किसानों को बेहतर दाम मिल सकते हैं। हालांकि, यह तर्क विवादित है।
5. वित्तीय समावेशन को बल इससे लोगों का बैंक खातों और डिजिटल लेनदेन से जुड़ाव बढ़ेगा, जो दीर्घकाल में फायदेमंद है।
6. राशन डीलरों के शोषण से मुक्ति लाभार्थियों को अब दुकानदार के मनमाने बर्ताव या ‘कम तौल’ का सामना नहीं करना पड़ेगा।

आलोचना और चिंताएं: क्यों हो रहा है विरोध?

इस प्रस्ताव की कई अर्थशास्त्रियों, नीति विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कड़ी आलोचना की है। उनकी मुख्य चिंताएं हैं:

1. खाद्य सुरक्षा का उद्देश्य खतरे में:
राशन प्रणाली का मूल उद्देश्य भूख से सुरक्षा है, न कि केवल वित्तीय सहायता देना। नकद मिलने पर यह गारंटी नहीं रह जाती कि पैसा अनाज खरीदने पर ही खर्च होगा। परिवार में किसी बीमारी, शादी, कर्ज चुकाने या अन्य जरूरतों के चलते यह पैसा खाद्यान्न से हटकर कहीं और खर्च हो सकता है। इससे परिवार, खासकर बच्चों और महिलाओं का पोषण स्तर गिरने का खतरा है।

राशन का खेल खत्म! अब चावल-गेहूं नहीं, सीधे खाते में मिलेगा पैसा – मोदी सरकार का बड़ा फैसला

2. मुद्रास्फीति और बाजार की अनिश्चितता:
अचानक 80 करोड़ लोग बाजार में अनाज खरीदने उतरेंगे, तो इससे मांग बहुत बढ़ जाएगी। अगर आपूर्ति न बढ़ी, तो अनाज की कीमतें आसमान छू सकती हैं। सरकारी सब्सिडी की रकम तय है, लेकिन बाजार मूल्य बढ़ने पर वह रकम पर्याप्त नहीं रह जाएगी। लाभार्थी फिर से परेशान हो जाएंगे।

3. डिजिटल और बैंकिंग बुनियादी ढांचे की चुनौती:

  • बैंक खाता न होना या सक्रिय न होना: जन-धन खातों का एक बड़ा हिस्सा निष्क्रिय है।

  • नेटवर्क और ट्रांजैक्शन की समस्या: ग्रामीण-दूरदराज के इलाकों में इंटरनेट और बैंकिंग सेवाएं अभी भी अस्थिर हैं।

  • आधार-बैंक लिंकेज में गड़बड़ी: छोटी सी लिंकिंग की गलती से पैसा न आने का जोखिम रहेगा।

4. महिलाओं पर नकारात्मक प्रभाव:
राशन कारड अक्सर महिलाओं के नाम पर होते हैं, जिससे उन्हें घर में वित्तीय और खाद्य सुरक्षा का अधिकार मिलता है। नकद सीधे परिवार के मुखिया (पुरुष) के खाते में जा सकता है, जिससे महिलाओं की वह निर्णय लेने की शक्ति छिन सकती है। राशन दुकान जाना महिलाओं के लिए सार्वजनिक जीवन में भागीदारी का एक माध्यम भी है।

5. राशन दुकानों और रोजगार का संकट:
देश भर में लाखों राशन दुकानदार हैं। इस व्यवस्था से उनकी आजीविका खतरे में पड़ जाएगी। सरकार को इस बड़े बदलाव के सामाजिक-आर्थिक नतीजों पर भी विचार करना होगा।

6. आपातकाल में असफलता:
कोविड-19 लॉकडाउन के समय राशन प्रणाली एक जीवनरेखा साबित हुई थी। बाजार बंद थे, लेकिन राशन दुकानें चल रही थीं। नकद ट्रांसफर मॉडल ऐसी आपात स्थितियों में असफल हो सकता है, क्योंकि पैसा होने के बावजूद अगर दुकानों में अनाज नहीं होगा, तो लोग भूखे रह जाएंगे।

कैश ट्रांसफर बनाम फूड सब्सिडी: वैश्विक अनुभव

दुनिया के कई देश प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण मॉडल अपना चुके हैं। ब्राजील, मैक्सिको, फिलीपींस जैसे देशों में इसके सकारात्मक नतीजे देखे गए हैं, जहां इससे गरीबी कम करने में मदद मिली। लेकिन इन देशों में सशर्त नकद हस्तांतरण (Conditional Cash Transfer) है, जहां पैसा तभी मिलता है जब परिवार बच्चों की शिक्षा, टीकाकरण आदि शर्तें पूरी करे। भारत का प्रस्ताव बिना शर्त का है।

वहीं, अमेरिका जैसे विकसित देश में ‘फूड स्टैम्प’ प्रोग्राम (जो किसी तरह के कूपन/वाउचर जैसा है) चलता है, जिसका उपयोग सिर्फ खाद्य पदार्थ खरीदने के लिए ही किया जा सकता है। यह सीधे नकदी नहीं है।

सीख: हर देश की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां अलग हैं। भारत जैसे विशाल, विविधतापूर्ण और असमानता वाले देश के लिए बिना किसी सख्त शर्त और मजबूत सुरक्षा तंत्र के केवल नकद हस्तांतरण जोखिम भरा हो सकता है।

रास्ता आगे: संतुलन और सावधानी जरूरी

स्पष्ट है कि मौजूदा पीडीएस में सुधार की जरूरत है, लेकिन शायद इसे पूरी तरह से खत्म करके नहीं। एक मध्यम मार्ग ही बेहतर हो सकता है:

  1. वैकल्पिक मॉडल: लाभार्थी को विकल्प दिया जाए। वह चाहे तो पारंपरिक रूप से अनाज ले, या फिर कैश ट्रांसफर चुने। कुछ राज्य पहले से ही ऐसा प्रयोग कर रहे हैं।

  2. पायलट प्रोजेक्ट और आकलन: किसी भी बड़े बदलाव से पहले विभिन्न राज्यों में बड़े पैमाने पर पायलट प्रोजेक्ट चलाए जाएं। उनके नतीजों का स्वतंत्र आकलन हो।

  3. डीबीटी-राशन का संकर मॉडल: राशन दुकानों को आधुनिक बनाया जाए, पारदर्शिता बढ़ाई जाए। डीबीटी का इस्तेमाल सिर्फ उन इलाकों में किया जाए जहां भौतिक व्यवस्था बहुत खराब है या लाभार्थी वास्तव में चाहते हैं।

  4. महिला खाते में सीधा ट्रांसफर: अगर डीबीटी लागू भी हो, तो पैसा सीधे परिवार की महिला सदस्य के खाते में जाए, ताकि उसकी सशक्तिकरण में भूमिका बनी रहे।

  5. मूल्य नियंत्रण तंत्र: सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि बाजार में अनाज की पर्याप्त आपूर्ति और उचित दाम बनाए रखे, ताकि नकद सहायता कारगर रहे।

“राशन का खेल खत्म” करने का सरकार का इरादा सही है, क्योंकि भ्रष्टाचार पर चोट जरूरी है। लेकिन “चावल-गेहूं की जगह पैसा” देने का फैसला एक दोधारी तलवार है। एक तरफ यह दक्षता, पसंद की आजादी और वित्तीय समावेशन ला सकता है। दूसरी तरफ, यह देश की खाद्य सुरक्षा की गारंटी को कमजोर कर सकता है, गरीबों को बाजार की अनिश्चितता के हवाले कर सकता है और महिलाओं की स्थिति पर असर डाल सकता है।

आखिरकार, यह योजना उन 80 करोड़ भारतीयों के लिए है जो अपनी मूलभूत जरूरतों के लिए सरकार पर निर्भर हैं। किसी भी बदलाव का केंद्र में उनकी भलाई और पोषण की सुरक्षा होनी चाहिए, न कि सिर्फ व्यवस्था की दक्षता। इसलिए, इस ऐतिहासिक बदलाव पर सभी पक्षों – सरकार, विपक्ष, नीति निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों और सबसे महत्वपूर्ण, लाभार्थियों – के बीच गहन विचार-विमर्श और सहमति बनाना अत्यंत आवश्यक है। जल्दबाजी में उठाया गया कदम दशकों से चली आ रही खाद्य सुरक्षा की एक मजबूत व्यवस्था को झटका दे सकता है।

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